सोमवार, 28 दिसंबर 2015

सालनामचा : २०१५

कुछ कतरनें हैं बीतते बरस के शुरुआत की 

******

"बाद मुद्दत के जैसे आफताब निकले, 
तो रौशनी को दरख्तों में बंद कर लेने की आरज़ू रहती है । 
तेरा प्यार भी कुछ ऐसा ही रहा है ।"

"क़त्ल होते हैं चंद मिनट गर एक सिगरेट से,
बहुत कम हैं तेरे बगैर बीतती ज़िन्दगी के सामने"

"दिल की ऐश-ट्रे रोज़ खाली करता हूँ मशक्कत से ,
तेरी यादों के टुकड़े फिर भर जाते हैं, ना जाने कहाँ से"

"पहचान कभी अजनबियों में भी निकल आती है,
कभी कोई अपना होकर भी पहचानता नहीं"

"मिला है एक पुराना अखबार ,
कागज़ातों के बण्डल से ,
तुम्हारी खुशबू जवां है देखो तो ।"

"अब वो चिट्ठी भी बैरंग वापस आ जाती है , 
जो खुद को लिखता हूँ "

"इश्क़ में बेवफा कोई होता है भला ,
तुम कभी नहीं थी और मैं आज भी नहीं "

"नशा छोड़ देने का मन करता है अक्सर,
तुम्हारी याद ज्यादा दिलाता है कमबख्त"

******

२१०६ मुबारक हो सभी को !!!!


मंगलवार, 6 जनवरी 2015

जो तुझमें वफ़ा होती...

जो तुझमे वफ़ा होती
तो कमसकम एक बार रूकती, मुड़ती ।
हाथ चूमती या गले लग जाती ,
और कहती मुझे जाने दो|

जाने शायद तब भी न देता,
तुम भी रूकती नहीं ।

पर तुम न ठहरी ,मुड़ के भी ना देखा ।
ना वो आखिरी बात का टुकड़ा पूरा हो सका ।
ना लफ़ज़ मिले उस सवाल को जो बाकी रहा।

वो कहते हैं न की कोई तो वजह रही होगी दूर जाने की
यूँ ही कोई बेवफा नहीं होता ।

सुनो, उसी वजह जानने में ये ऊमर कटेगी ।
तब तक तू ही बता
कैसे मान लूं की तुझमे वफ़ा थी !!!

मंगलवार, 21 जनवरी 2014

कैसे कहूं….

 

सूरज की किरणों के ज़मीं पर पड़ने से ठीक पहले,

अधजगे से बिस्तर पर पड़े हुए,

तुम्हारा जो मुस्कुराता हुआ चेहरा ज़हन में आ जाता है |

मैं उसी मुस्कान के तसव्वुर में उठता हूँ,

कैसे कहूं !!! मैं तुमसे कितना प्यार करता हूँ |

 

शाम अधूरी सी ही बीतती है अब ,

ना मालूम कुछ अनछुआ सा रह जाता हो जैसे हर रोज़ |

पर जब ढलते सूरज के साथ चिड़िया घर वापस आती है ,

उसकी आवाज़ में मैं तुम्हारे तराने सुनता हूँ,

कैसे कहूं !!! मैं तुमसे कितना प्यार करता हूँ |

 

--देवांशु

गुरुवार, 11 जुलाई 2013

ज़िन्दगी !!!


ज़िन्दगी!!! एक अनसुलझे सवालों की किताब है,
है समंदर सी फैली , बादलों सी घिरी और न जाने क्या - क्या,
कुछ अधुरी सी , पर क्या , पता नहीं, न जवाब मालूम,
न जानने का सबब है, न जानने को बेताब है..
ज़िन्दगी एक अनसुलझे सवालों की किताब है|

है दरिया भी मिल चुका साहिलों से अब ,
जानते हुए सब कुछ, न जाना है इसने कुछ भी,
रहता है अश्क बनके खाबों का टूटा सफ़र आज भी,
ज़िन्दगी समझ लो बस ऐसा ही एक एक खाब है,
ये ज़िन्दगी ऐसे ही अनसुलझे सवालों की किताब है|

ज़ब दिल की दस्तक पर सिहर नहीं उठती,
उठता है तो सिर्फ दर्द, और दर्द का एक बहाना,
ज़ब हर वक़्त लगता है की कल कितना खुशनुमा था,
मांगती धड़कनों से भी उनके चलने का हिसाब है,
बस यही ज़िन्दगी है और ये ज़िन्दगी,
ऐसे ही अनसुलझे सवालों की किताब है...

--देवांशु

मंगलवार, 11 जून 2013

जहाँ सितारों का !!!

याद है,

छिटके तारों की छतरी वाले आसमाँ के नीचे,

अक्सर फोन पर बात करते हुए,

सितारों को जोड़कर जब एक दूसरे का नाम लिखा करते थे,

तुम कहतीं ,

मेरा नाम सितारों में जंचता है,

मैं कहता,

तुम्हारा नाम आसमाँ  में सुन्दर दिखता है |

 

फिर एक रोज़ आसमाँ  में बादल छा गए,

खूब बरसे पर छंटे नहीं |

और जब हटे तो साथ होने के सारे आसार साथ बहा ले गए |

 

कल रात मैं यूँ ही सय्यारों में भटक रहा था,

कुछ सितारों को मिलके अपना नाम बनाते देखा,

शायद तुमने फिर से याद किया होगा |

 

अब सितारों के जहाँ में मिलना ही हमारी किस्मत है !!!!

 

गुरुवार, 11 अप्रैल 2013

मयस्सर नहीं खुदा तो इन्सां ही गंवारा कर दे


मयस्सर नहीं खुदा तो इन्सां ही गंवारा कर दे,
नहीं तो कम से कम वो वक़्त दुबारा कर दे||

जीते थे जिनके नाम पर मरते थे उन्ही पे,
थे सुनते ,थे गाते , सदके उन्ही के,
न रहने को मंजर न पिलाने को साकी,
न सहने को दर्द का किनारा कर दे,
नहीं तो कम से कम वो वक़्त दुबारा कर दे||

हैं चुभते फूल इन पलकों, इन आँखों में ,
हैं बस गए आंसूं समझकर घर, इन आखों में,
न जीने को जीवन, न मरने को मौत,
न पीने को पानी, न सांसों का इशारा कर दे,
नहीं तो कम से कम वो वक़्त दुबारा कर दे||

मयस्सर नहीं खुदा तो इन्सां ही गंवारा कर दे,
नहीं तो कम से कम वो वक़्त दुबारा कर दे||

सोमवार, 22 अक्टूबर 2012

क्या ज़रुरत है मुझे सौ बरस जीने की….

मुझे भीष्म की तरह इच्छा-मृत्यु नहीं चाहिए,
ना चाहिए कोई जीवेत शरदः शतं का वरदान,
गर दे सकता है तो खुदा मुझे नेमत दे ,
लम्हों को रोक सकने की!!!
 image
वो एक लम्हा जब वो मेरे सबसे करीब हो,
मैं उसकी धड़कन सुन सकूं ,
उसे भी मेरे साँसें सुनाई दे रही हों,
हाँ बस वही लम्हा, थाम लूं, फ्रीज़ कर दूं |
 
और जब वो लम्हा गुज़रे ,
फिर गर तू मौत भी बख्शे तो नूर समझूंगा|
तू ही बता जब जिन्दगी खुद लम्हों में जीती है ,
तो क्या ज़रुरत है मुझे सौ बरस जीने की !!!!
--देवांशु











गुरुवार, 18 अक्टूबर 2012

इंतज़ार है !!!!

किसी रोज़ यूँ भी होगा,

तुम बैठोगी मेरे कमरे की खिड़की पर,

और आसमां पर लटका चाँद शरमा जायेगा !!!!

 

कि होगा कुछ यूँ भी,

तुम गुनगुनाओगी कोई नगमा अपने बाल बनाते हुए,

और हवा में खुशबू खिल पड़ेगी, फ़ैल जाएगी !!!

image 

हाँ, होगा ये भी,

जब लुढ़काओगी चावल से भरा हुआ वो कलश अपने पैरों से ,

ये घर तुम्हारी बासमती से महक उठेगा !!!!

 

और ये तो हर रोज़ होगा,

जब इबादत में झुकेंगी हमारी नज़रें,

हर नूर बरस उठेगा , हम दोनो की ज़िंदगी में|

 

मुझे इंतज़ार है उस दिन का , हाँ  इंतज़ार !!!!

मंगलवार, 25 सितंबर 2012

तुम जो नहीं हो तो...



चाँद डूबा नहीं है पूरा, थोड़ा बाकी है |
वो जुगनू जो अक्सर रात भर चमकने पर,
सुबह तक थक जाता, रौशनी मंद हो जाती थी,
अभी भी चहक रहा है, बस थोड़ा सुस्त है |


यूँ लगता है जैसे रात पूरी, जग के सोयी है ,
आँख में जगने की नमी है,
दिल में नींद की कमी |
सूरज के आने का सायरन,
अभी एक गौरेया बजाकर गयी है |



अब चाँद बादलों की शाल ओढ़ छुप गया है ,
सो गया हो शायद, थक गया होगा रात भर चलता जो रहा |
मेरी मेज़ पर रखी घड़ी में भी,
सुबह जगने का अलार्म बज चुका है |
गमलों में बालकनी है, डालें उससे लटक रही हैं ,

फूल भी हैं , बस तुम्हारी खुशबू नहीं. महकती ...


-- देवांशु


(चित्र गूगल इमेजेस से)


शुक्रवार, 24 अगस्त 2012

जंगल



उस घने हरे भरे जंगल को देखकर कुछ यूँ लगा,
कि बारिश भी कितनी पाक होती है |
और जब यही बारिश पेड़ों के पत्तों से छनकर ज़मीं पर गिरती है,
तो इस ज़मीं को ज़न्नत सा खुशनसीब कर जाती है|




जंगल की उसी ज़मीं को देख ये खयाल जागा,
कि चलो वहीं चलें,
छोड़ आयें अपना रिश्ता वहीं |
इस रिश्ते का ना तो कोई नाम रख पाए हम,
न किसी और ने तवज्जो ही बख्शी,
कम से कम उस मुक़द्दस ज़मीं पर,
इसे ज़न्नत तो नसीब हो जायेगी | 


चलो इक बार ही सही, उसी जंगल में चलते हैं !!!!


-- देवांशु

सोमवार, 6 अगस्त 2012

बारिश



कल रात आंसुओं की हल्की बूंदा-बांदी हुई,
और अज़ल से प्यासी ज़मीन-ए-हसरत तड़प उठी ।
कोई सैलाब भी ना आया, जो गम बह जाता,
बस बुझते अरमानों के धुंए से उमस सी भड़क उठी ।






आज फिर तेरी यादों के गहरे काले बादल छाये हैं ।
इस बारिश में मेरा खो जाना ही मुनासिब होगा शायद !!!!
--देवांशु

(Image from Flickr)

मंगलवार, 10 जुलाई 2012

ना जीना ना मरना

पैदा मैं हुआ नहीं,
अवतार मुझ जैसों का होता नहीं|
कटती है घुट के ज़िंदगी,
वक्त कभी बेख़ौफ़ सा होता नहीं |

एक रात जब आंसू की चादर बिछेगी,
एक भी मोती न होगा उसमें,
सिर्फ एक अनचाहा पानी,
और ज़िंदगी का नमक....

बस उस दिन रूह शांत हो जायेगी,
जो पैदा नहीं होते उन्हें मरने का हक नहीं,
जिन्होंने अवतार नहीं लिया, उनका,
परिनिर्वाण भी होता नहीं !!!!!


--देवांशु 

मंगलवार, 26 जून 2012

वो वक़्त भी आएगा..

कि एक वक़्त आएगा...हाँ वो वक़्त भी आएगा...तब  पूछूंगा ...
बता सकता है तो बता, कि उस वक़्त तेरी रज़ा  क्या थी ...

हाँ ठीक उसी वक़्त जब मेरे सर से किसी का साया जा रहा था,
दोनों हाथ जोड़ मांगा था तुझसे कुछ, आँखों में आंसूं भी थे,
पर ऐसा छोड़ा हाथ तूने, मेरे हाथ कुछ भी ना लगा....
आँखों में आँखें डाल पूछूंगा तब, कि  इसकी वजह क्या थी ...
बता सकता है तो बता, कि उस वक़्त तेरी रज़ा  क्या थी ...

या उस दिन, जब चंद कागज़ के टुकड़ों पर लिखे मुट्ठी भर लफज़,
ख़त्म कर रहे थे दो जिंदगियां, बड़ी बेरहमी से,तू कहाँ था ?
यकीनन तेरी तामीरत से मुझे इनकार नहीं था ,
पर कह तो सही , हुई हमसे भी ऐसी खता क्या थी..
बता सकता है तो बता, कि उस वक़्त तेरी रज़ा  क्या थी ...

सुना तू मशरूफ बड़ा है इन दिनों, किसी से मिलता नहीं,
तेरी ही कायनात के बाशिंदे हैं सारे, पर दिल तेरा पिघलता नहीं,
जो मौत है  मुनासिब, तो वही मुक़र्रर कर,फिर मैं भी जानूं ,
खा गयी जो गुलशन मेरा, ऐसी बदसूरत खिज़ा क्या थी..
बता सकता है तो बता, कि उस वक़्त तेरी रज़ा  क्या थी ...
 --देवांशु 

बुधवार, 25 जनवरी 2012

मैं एक अधूरा खाब बुनता हूँ…

मैं एक अधूरा खाब बुनता हूँ,

कुछ रुई के फाहों से बिखरे लम्हे,
कुछ तकली से संजीदा बीते दिन,
और उलझनों में फंस उनका घूमना,
एक-एक रेशा जिंदगी का,
आपस में लिपट-लिपट कर,
कुछ यूँ खिंचा चला आता है,
कि सांसों का धागा बनने लगता है|

फिर ढूंढ एक जुलाहे को वो धागा सौंप देता हूँ,
कि कोई तो एक राह दे,
उस बेमन और अटपटे से बने धागे को,
और वो उसे अपने औजारों से सजाने लगता है,
कुछ गांठे बंधती हैं, धागा तराश दिया जाता है,
मशीन पे चढा के खींचा भी जाता है,
मैं उन मशीनों की ताल में तुमको सुनता हूँ,

मैं एक अधूरा खाब बुनता हूँ…
--देवांशु

बुधवार, 23 नवंबर 2011

लम्हें…

अब,
जबकि ये मालूम है,
नहीं मुमकिन,
तेरा मेरी जिंदगी में होना,
तो दो घड़ी बैठ,
सोचना चाहा, कुछ लम्हों के बारे में,

कुछ लम्हे,
जो मेरी गुज़री जिंदगी से हैं,
वो तुम्हारे करीब से गुज़रे थे,
वो गुजर गए,
उनका मुझे कोई अफ़सोस नहीं|

बात उन लम्हों की भी जो,
जो तुम्हारे जाने से अब तक बीते,
वो तुम्हारे पास कैद थे,
आज वो भी आजाद हो गए|

और फ़िक्र बाकी नहीं,
अब उन लम्हों की भी ,
जो अब बीतेंगे,
अन्धेरा नहीं होगा अब,

तेरे अक्स को शीशा नशीं कर रख लिया है,
उजाला मिलेगा जिंदगी को इसी से, तेरे जाने के बाद|

अब, फिर लौट मत देखना, मै बहुत खुश हूँ!!!!

गुरुवार, 3 नवंबर 2011

मोड़ पे बसा प्यार…

तुमने तो देखा होगा..
वो शख्स जो तुम्हारी गली के मोड़ पे रहता था..
मुस्कुराता था मुझ पर जब मैं,
तुम्हे देखने भर उधर आया करता था,
तुम घर से निकलती रहती थी,
मै साइकल की चेन चढ़ाता रहता था..
कभी-कभी नहीं आ पाता था तुम्हारे घर तक,
वो मुझे मोड़ से ही बिना कुछ कहे लौटा दिया करता था,
तुमने तो देखा होगा..
वो शख्स जो तुम्हारी गली के मोड़ पे रहता था..

gali

गुजरते उन गलियों से मैं हमेशा डरता रहा,
कि ये मुझे देख बस हँसता क्यूँ है,
कुछ कहता क्यूँ नहीं..
ना उसने कभी कुछ बोला,
ना मैं कभी पूँछ पाया,
पर जब उस दिन तुम जा रही थी ये शहर छोड़ कर,
मैं आया था,
पर वो नहीं था वहाँ, दो आँसूं रखे थे बस...
शायद तुमने देखा नहीं,
एक शख्स जो तुम्हारी गली के मोड़ पे रहता था..

--देवांशु

रविवार, 16 अक्टूबर 2011

कुछ याद आया है…


अक्सर याद आता है वो दिन,
जब मेरे कमरे की बालकनी में,
बैठा हुआ मैं, देख रहा था,
तुम्हे बारिश में भीगता हुआ|
मुझे जुकाम था, मैं बाहर नहीं आया था,
और तुमने मुझे देखा नहीं, हमेशा की तरह,
बारिश तुमपे गिरती रही फूलों सी,
और भीगता रहा मैं बंद कमरे में|
मेरी नज़र में बस गया,
वो तेरा भीगा सा साया था |
उस रात फिर एक बार,
मुझे जोरों का बुखार आया था||
 
rain

अगले दिन तुम, शायद गलती से,
गुजरी थी मेरी गली से,
मैं फिर बैठा था वहीँ बालकनी में,
पायल नहीं थीं, पैरों में तुम्हारे,
साज़ पायल की ही गूंजी थी मेरे कानों में,
जब भी बताता हूँ दोस्तों को अपने,
मुझपे मुहावरे कसते हैं, कहते हैं,
करा इलाज़ किसी हकीम से अपना,
बारिश में तो तेरे कान बजते हैं||
 

मैं हर दिन गुज़रता था उसी गली से,
हर कोने को अपनी आँखों से छूता हुआ,
जहाँ से तुम गुजरी थीं,
तुम मुझे महसूस होती थीं हर बार,
कभी खुद से ही कह बैठा था मैं कि,
गुजर इन गलियों से जरा, मेरे दिल धीरे-धीरे,
कभी ठहरा था तेरा महबूब दो पल को यहाँ|
 

आज सालों बाद ये फ़साना याद आया है,
पाता नहीं क्यूँ मुझे ये सब फिर याद आया है,
होता है अक्सर ऐसा भी,
कि ना हो कुछ गम फिर भी,
रोने का जी चाहे,
इस दिल के नगीने को खोने का जी चाहे,
फकत एक रात काफी है, सब कुछ तोड़ देने को,
एक जाम रोशन है, जो सब बंधे हुए है……
 

--देवांशु

रविवार, 9 अक्टूबर 2011

तस्वीर ही सही…

खुद से नाराज़,
और थोड़ा सा बहका हुआ,
मेरा दिल,
रात गहरी होने पर,
एक आरजू सी करता है,
और कहता है,
कि ये समां वाकई अधूरा सा है |

पूरी रात,
जगने के बाद,
किसी पुराने फोल्डर में,
तुम्हारी एक प्याज काटते हुए तस्वीर,
जो मैंने छुप के खींची थी,
दिख जाती है,
आँखें मेरी डबडबा जाती हैं |


ये आँसू ही गवाह हैं,
तेरे मुझसे दूर होने का,
और मेरे,
सदा तेरे करीब होने का….

-- देवांशु

शुक्रवार, 30 सितंबर 2011

मुस्कान….

रुका सा,
कुछ ठहरा हुआ सा,
ये वक़्त,
कुछ कहने की,
कोशिश सा करता हुआ|

सब जानकर अनजान,
अपना हो के भी,
बेगाना |

वो सब भूल,
जो अब तक है बीता,
दौडने लग जाता,
और जीने लगता,
वही जिंदगी,
जो एक बार ही सही,
पर प्यार से,
“तुम" मुस्कुरा देतीं…

मंगलवार, 30 अगस्त 2011

मोम सी जिंदगी…

एक टुकड़ा आस की वो सिहरन,
कि जब ये अहसास हो,
दूरी हमारे बीच कुछ बढ़ सी गयी है|
आ गयी है चटक उस रिश्ते में,
जो पाक था दोनों ही दिलों में,
और नज़रों में  बसा  वो अँधेरा,
चादर पे पड़ी कोई सलवट तो नहीं,
जिसे कोई सीधाकर हटा दे|

रोशनी और आग,
दोनों लिए एक मोमबत्ती,
जिसका मोम खत्म ना होता हो,
बस घटता रहता हो,
कुछ उसी तरह जीता हूँ अब,
दिखता खुश एक आग समेटे,
और मोम बन घटे जा रही है
ये जिंदगी “तुम" बिन….बस!!!!
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-- देवांशु