मंगलवार, 10 जुलाई 2012

ना जीना ना मरना

पैदा मैं हुआ नहीं,
अवतार मुझ जैसों का होता नहीं|
कटती है घुट के ज़िंदगी,
वक्त कभी बेख़ौफ़ सा होता नहीं |

एक रात जब आंसू की चादर बिछेगी,
एक भी मोती न होगा उसमें,
सिर्फ एक अनचाहा पानी,
और ज़िंदगी का नमक....

बस उस दिन रूह शांत हो जायेगी,
जो पैदा नहीं होते उन्हें मरने का हक नहीं,
जिन्होंने अवतार नहीं लिया, उनका,
परिनिर्वाण भी होता नहीं !!!!!


--देवांशु 

मंगलवार, 26 जून 2012

वो वक़्त भी आएगा..

कि एक वक़्त आएगा...हाँ वो वक़्त भी आएगा...तब  पूछूंगा ...
बता सकता है तो बता, कि उस वक़्त तेरी रज़ा  क्या थी ...

हाँ ठीक उसी वक़्त जब मेरे सर से किसी का साया जा रहा था,
दोनों हाथ जोड़ मांगा था तुझसे कुछ, आँखों में आंसूं भी थे,
पर ऐसा छोड़ा हाथ तूने, मेरे हाथ कुछ भी ना लगा....
आँखों में आँखें डाल पूछूंगा तब, कि  इसकी वजह क्या थी ...
बता सकता है तो बता, कि उस वक़्त तेरी रज़ा  क्या थी ...

या उस दिन, जब चंद कागज़ के टुकड़ों पर लिखे मुट्ठी भर लफज़,
ख़त्म कर रहे थे दो जिंदगियां, बड़ी बेरहमी से,तू कहाँ था ?
यकीनन तेरी तामीरत से मुझे इनकार नहीं था ,
पर कह तो सही , हुई हमसे भी ऐसी खता क्या थी..
बता सकता है तो बता, कि उस वक़्त तेरी रज़ा  क्या थी ...

सुना तू मशरूफ बड़ा है इन दिनों, किसी से मिलता नहीं,
तेरी ही कायनात के बाशिंदे हैं सारे, पर दिल तेरा पिघलता नहीं,
जो मौत है  मुनासिब, तो वही मुक़र्रर कर,फिर मैं भी जानूं ,
खा गयी जो गुलशन मेरा, ऐसी बदसूरत खिज़ा क्या थी..
बता सकता है तो बता, कि उस वक़्त तेरी रज़ा  क्या थी ...
 --देवांशु 

बुधवार, 25 जनवरी 2012

मैं एक अधूरा खाब बुनता हूँ…

मैं एक अधूरा खाब बुनता हूँ,

कुछ रुई के फाहों से बिखरे लम्हे,
कुछ तकली से संजीदा बीते दिन,
और उलझनों में फंस उनका घूमना,
एक-एक रेशा जिंदगी का,
आपस में लिपट-लिपट कर,
कुछ यूँ खिंचा चला आता है,
कि सांसों का धागा बनने लगता है|

फिर ढूंढ एक जुलाहे को वो धागा सौंप देता हूँ,
कि कोई तो एक राह दे,
उस बेमन और अटपटे से बने धागे को,
और वो उसे अपने औजारों से सजाने लगता है,
कुछ गांठे बंधती हैं, धागा तराश दिया जाता है,
मशीन पे चढा के खींचा भी जाता है,
मैं उन मशीनों की ताल में तुमको सुनता हूँ,

मैं एक अधूरा खाब बुनता हूँ…
--देवांशु

बुधवार, 23 नवंबर 2011

लम्हें…

अब,
जबकि ये मालूम है,
नहीं मुमकिन,
तेरा मेरी जिंदगी में होना,
तो दो घड़ी बैठ,
सोचना चाहा, कुछ लम्हों के बारे में,

कुछ लम्हे,
जो मेरी गुज़री जिंदगी से हैं,
वो तुम्हारे करीब से गुज़रे थे,
वो गुजर गए,
उनका मुझे कोई अफ़सोस नहीं|

बात उन लम्हों की भी जो,
जो तुम्हारे जाने से अब तक बीते,
वो तुम्हारे पास कैद थे,
आज वो भी आजाद हो गए|

और फ़िक्र बाकी नहीं,
अब उन लम्हों की भी ,
जो अब बीतेंगे,
अन्धेरा नहीं होगा अब,

तेरे अक्स को शीशा नशीं कर रख लिया है,
उजाला मिलेगा जिंदगी को इसी से, तेरे जाने के बाद|

अब, फिर लौट मत देखना, मै बहुत खुश हूँ!!!!

गुरुवार, 3 नवंबर 2011

मोड़ पे बसा प्यार…

तुमने तो देखा होगा..
वो शख्स जो तुम्हारी गली के मोड़ पे रहता था..
मुस्कुराता था मुझ पर जब मैं,
तुम्हे देखने भर उधर आया करता था,
तुम घर से निकलती रहती थी,
मै साइकल की चेन चढ़ाता रहता था..
कभी-कभी नहीं आ पाता था तुम्हारे घर तक,
वो मुझे मोड़ से ही बिना कुछ कहे लौटा दिया करता था,
तुमने तो देखा होगा..
वो शख्स जो तुम्हारी गली के मोड़ पे रहता था..

gali

गुजरते उन गलियों से मैं हमेशा डरता रहा,
कि ये मुझे देख बस हँसता क्यूँ है,
कुछ कहता क्यूँ नहीं..
ना उसने कभी कुछ बोला,
ना मैं कभी पूँछ पाया,
पर जब उस दिन तुम जा रही थी ये शहर छोड़ कर,
मैं आया था,
पर वो नहीं था वहाँ, दो आँसूं रखे थे बस...
शायद तुमने देखा नहीं,
एक शख्स जो तुम्हारी गली के मोड़ पे रहता था..

--देवांशु

रविवार, 16 अक्टूबर 2011

कुछ याद आया है…


अक्सर याद आता है वो दिन,
जब मेरे कमरे की बालकनी में,
बैठा हुआ मैं, देख रहा था,
तुम्हे बारिश में भीगता हुआ|
मुझे जुकाम था, मैं बाहर नहीं आया था,
और तुमने मुझे देखा नहीं, हमेशा की तरह,
बारिश तुमपे गिरती रही फूलों सी,
और भीगता रहा मैं बंद कमरे में|
मेरी नज़र में बस गया,
वो तेरा भीगा सा साया था |
उस रात फिर एक बार,
मुझे जोरों का बुखार आया था||
 
rain

अगले दिन तुम, शायद गलती से,
गुजरी थी मेरी गली से,
मैं फिर बैठा था वहीँ बालकनी में,
पायल नहीं थीं, पैरों में तुम्हारे,
साज़ पायल की ही गूंजी थी मेरे कानों में,
जब भी बताता हूँ दोस्तों को अपने,
मुझपे मुहावरे कसते हैं, कहते हैं,
करा इलाज़ किसी हकीम से अपना,
बारिश में तो तेरे कान बजते हैं||
 

मैं हर दिन गुज़रता था उसी गली से,
हर कोने को अपनी आँखों से छूता हुआ,
जहाँ से तुम गुजरी थीं,
तुम मुझे महसूस होती थीं हर बार,
कभी खुद से ही कह बैठा था मैं कि,
गुजर इन गलियों से जरा, मेरे दिल धीरे-धीरे,
कभी ठहरा था तेरा महबूब दो पल को यहाँ|
 

आज सालों बाद ये फ़साना याद आया है,
पाता नहीं क्यूँ मुझे ये सब फिर याद आया है,
होता है अक्सर ऐसा भी,
कि ना हो कुछ गम फिर भी,
रोने का जी चाहे,
इस दिल के नगीने को खोने का जी चाहे,
फकत एक रात काफी है, सब कुछ तोड़ देने को,
एक जाम रोशन है, जो सब बंधे हुए है……
 

--देवांशु

रविवार, 9 अक्टूबर 2011

तस्वीर ही सही…

खुद से नाराज़,
और थोड़ा सा बहका हुआ,
मेरा दिल,
रात गहरी होने पर,
एक आरजू सी करता है,
और कहता है,
कि ये समां वाकई अधूरा सा है |

पूरी रात,
जगने के बाद,
किसी पुराने फोल्डर में,
तुम्हारी एक प्याज काटते हुए तस्वीर,
जो मैंने छुप के खींची थी,
दिख जाती है,
आँखें मेरी डबडबा जाती हैं |


ये आँसू ही गवाह हैं,
तेरे मुझसे दूर होने का,
और मेरे,
सदा तेरे करीब होने का….

-- देवांशु