सोमवार, 22 अक्तूबर 2012

क्या ज़रुरत है मुझे सौ बरस जीने की….

मुझे भीष्म की तरह इच्छा-मृत्यु नहीं चाहिए,
ना चाहिए कोई जीवेत शरदः शतं का वरदान,
गर दे सकता है तो खुदा मुझे नेमत दे ,
लम्हों को रोक सकने की!!!
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वो एक लम्हा जब वो मेरे सबसे करीब हो,
मैं उसकी धड़कन सुन सकूं ,
उसे भी मेरे साँसें सुनाई दे रही हों,
हाँ बस वही लम्हा, थाम लूं, फ्रीज़ कर दूं |
 
और जब वो लम्हा गुज़रे ,
फिर गर तू मौत भी बख्शे तो नूर समझूंगा|
तू ही बता जब जिन्दगी खुद लम्हों में जीती है ,
तो क्या ज़रुरत है मुझे सौ बरस जीने की !!!!
--देवांशु











16 टिप्‍पणियां:

  1. सच है......
    तेरे साथ गुज़रा वो एक पल....और हमने पूरी जिंदगी जी ली....

    अनु

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  2. बहुत अच्छे...सच कतरा-कतरा बहती है, बहने दो...जीने को दो पल भी काफी, जीने को सौ बरस भी कम..

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  3. उस एक लमहे को पाने के लिए
    बहुत ज्यादा नीरस ज़िन्दगी
    जीना पड़े ...
    नीरस ज़िन्दगी और
    इंतज़ार भरी ज़िन्दगी ...
    और वह लम्हा आ कर गुज़र जाए,
    न रुके न थमे ...
    शेष रह जाए नीरस
    और इंतज़ार भरी ज़िन्दगी
    जिसे जी लें फिर
    उस एक लमहे के लिए।

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  4. कलकत्ता की दुर्गा पूजा - ब्लॉग बुलेटिन पूरी ब्लॉग बुलेटिन टीम की ओर से आप सब को दुर्गा पूजा की हार्दिक बधाइयाँ और शुभकामनायें ! आज की ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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    1. Saari posts padh k aapko similar thoughts kaise aa jate hain? Har post dil ko kaise chhoo jati h... abhi haal haal me 3 posts pe aapka same comment dekh chuki hu :-/

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  6. काश सब कुछ फ्रीज़ हो सकता ...तो जिंदगी अपनी मुताबिक आसान हो जाती

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  7. हाँ बस वही लम्हा, थाम लूं, फ्रीज़ कर दूं
    bhavpurn

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