बुधवार, 23 नवंबर 2011

लम्हें…

अब,
जबकि ये मालूम है,
नहीं मुमकिन,
तेरा मेरी जिंदगी में होना,
तो दो घड़ी बैठ,
सोचना चाहा, कुछ लम्हों के बारे में,

कुछ लम्हे,
जो मेरी गुज़री जिंदगी से हैं,
वो तुम्हारे करीब से गुज़रे थे,
वो गुजर गए,
उनका मुझे कोई अफ़सोस नहीं|

बात उन लम्हों की भी जो,
जो तुम्हारे जाने से अब तक बीते,
वो तुम्हारे पास कैद थे,
आज वो भी आजाद हो गए|

और फ़िक्र बाकी नहीं,
अब उन लम्हों की भी ,
जो अब बीतेंगे,
अन्धेरा नहीं होगा अब,

तेरे अक्स को शीशा नशीं कर रख लिया है,
उजाला मिलेगा जिंदगी को इसी से, तेरे जाने के बाद|

अब, फिर लौट मत देखना, मै बहुत खुश हूँ!!!!

13 टिप्‍पणियां:

  1. Bohut khub.... kya andaaz hai dard bayan karne ka.... lagta hai kaafi gehraai se nikali hai ye. :) तेरे अक्स को शीशा नशीं कर रख लिया है,
    उजाला मिलेगा जिंदगी को इसी से, तेरे जाने के बाद| ..... Bohut khuub !!!

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  2. यादों को कुरेदती एक कविता ...चलो एक बार अजनबी हो जाएँ ..और अजनबी ही बने रहें? क्यों ?

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  3. pooja ki post se aapki post tak aa gai....chale hi gae to to loutkar na aana kyunki ab dard ki aadat si ho gai hai....अब, फिर लौट मत देखना, मै बहुत खुश हूँ!!!!acchi lagi kavita

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  4. अब, फिर लौट मत देखना, मै बहुत खुश हूँ ..

    ये नोस्टेलजिया ... गज़ब की यादें ... बरबस खींच रही है कविता अपनी तरफ ... लाजवाब ...

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  5. @ आशीष भाई ...शुक्रिया गुरु !!!
    @अरविन्द जी....अजनबी बना देना भी इतना आसान कहाँ होता है गुरुदेव!!!
    @ कनुप्रिया जी...शुक्रिया है जी!!!
    @दिगम्बर जी...ये यादें बहुत ज़रूरी हैं, जीवन का काफी बड़ा हिस्सा बीतता है इनके सहारे ...
    @ आलोक भाई...बिलकुल भाई..कोशिश जारी रहेगी!!!!

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  6. बहुत ख़ूबसूरत प्रस्तुति, बधाई.

    पधारें मेरे ब्लॉग पर भी और अपने स्नेहाशीष से अभिसिंचित करें मेरी लेखनी को, आभारी होऊंगा /

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  7. तेरे अक्स को शीशा नशीं कर रख लिया है,
    उजाला मिलेगा जिंदगी को इसी से, तेरे जाने के बाद|... गहरे भावों को सजाया है और जीने के नए सबब बताये हैं

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  8. और फ़िक्र बाकी नहीं,
    अब उन लम्हों की भी ,
    जो अब बीतेंगे,
    अन्धेरा नहीं होगा अब,
    ज़िन्दगी का सफर आगे को है .नखलिस्तान (ओएसिस )में अटका आदमी न इधर का न उधर का .

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