गुरुवार, 3 नवंबर 2011

मोड़ पे बसा प्यार…

तुमने तो देखा होगा..
वो शख्स जो तुम्हारी गली के मोड़ पे रहता था..
मुस्कुराता था मुझ पर जब मैं,
तुम्हे देखने भर उधर आया करता था,
तुम घर से निकलती रहती थी,
मै साइकल की चेन चढ़ाता रहता था..
कभी-कभी नहीं आ पाता था तुम्हारे घर तक,
वो मुझे मोड़ से ही बिना कुछ कहे लौटा दिया करता था,
तुमने तो देखा होगा..
वो शख्स जो तुम्हारी गली के मोड़ पे रहता था..

gali

गुजरते उन गलियों से मैं हमेशा डरता रहा,
कि ये मुझे देख बस हँसता क्यूँ है,
कुछ कहता क्यूँ नहीं..
ना उसने कभी कुछ बोला,
ना मैं कभी पूँछ पाया,
पर जब उस दिन तुम जा रही थी ये शहर छोड़ कर,
मैं आया था,
पर वो नहीं था वहाँ, दो आँसूं रखे थे बस...
शायद तुमने देखा नहीं,
एक शख्स जो तुम्हारी गली के मोड़ पे रहता था..

--देवांशु

8 टिप्‍पणियां:

  1. दिल से लिखी गयी रचना , कुछ दिन पहले कुछ इसी तरह के भाव समेटती एक रचना हमने भी लिखी थी ...
    http://aprnatripathi.blogspot.com/2011/11/blog-post.html

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  2. पर वो नहीं था वहाँ, दो आँसूं रखे थे बस...
    शायद तुमने देखा नहीं,
    एक शख्स जो तुम्हारी गली के मोड़ पे रहता था..

    भावमयी प्रस्तुति

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  3. निज पीड़ा को समष्टि से जोडती अनुभूति -बहुत सुन्दर !

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  4. सीधे अतीत की कुछ यादों को कुरेद लती है आपकी रचना ... बहुत ही कमाल का लिकते हैं आप ..

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  5. अपर्णा जी, संगीता जी, अरविन्द जी , दिगंबर जी ...आप सभी लोगो का शुक्रिया....

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  6. कुछ याद करो उस सुनसान गली का वो सूना सा मोड़
    बरसों पहले जहाँ पर तुमने ,अकेले मुझको दिया था छोड़

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    1. और मैं खड़ा हूँ वहीं, बुत बने हुए...
      हाँ!!! कभी कभी बुत भी सांस लेती है !!!!!

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  7. प्रभावशाली ....
    शुभकामनायें आपको !

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