मंगलवार, 21 जनवरी 2014

कैसे कहूं….

 

सूरज की किरणों के ज़मीं पर पड़ने से ठीक पहले,

अधजगे से बिस्तर पर पड़े हुए,

तुम्हारा जो मुस्कुराता हुआ चेहरा ज़हन में आ जाता है |

मैं उसी मुस्कान के तसव्वुर में उठता हूँ,

कैसे कहूं !!! मैं तुमसे कितना प्यार करता हूँ |

 

शाम अधूरी सी ही बीतती है अब ,

ना मालूम कुछ अनछुआ सा रह जाता हो जैसे हर रोज़ |

पर जब ढलते सूरज के साथ चिड़िया घर वापस आती है ,

उसकी आवाज़ में मैं तुम्हारे तराने सुनता हूँ,

कैसे कहूं !!! मैं तुमसे कितना प्यार करता हूँ |

 

--देवांशु

4 टिप्‍पणियां:

  1. खूब .... उम्दा पंक्तियाँ रची हैं

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  2. बेहतरीन... बहुत बहुत बहुत उम्दा

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  3. इस गिटार की धुन के साथ इन पंक्तियों को बोलना था न .. बहुत सुन्दर लगता.

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